महाशिवरात्रि शुभ मुहुर्त 2022 – महाशिवरात्रि कब की है 2022 | Shivratri Muhurta 2022 | Mahashivratri 2022 Date

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महाशिवरात्रि शुभ मुहुर्त 2022 – महाशिवरात्रि कब की है 2022 | Shivratri Muhurta 2022 | Mahashivratri 2022 date | Mahashivratri kab ki hai 2022 | Mahashivratri 2022 in hindi

महाशिवरात्रि शुभ मुहुर्त 2022 - महाशिवरात्रि कब की है 2022 | Shivratri Muhurta 2022 | Mahashivratri 2022 date
Mahashivratri 2022

 

 

Mahashivratri 2022 Date

महाशिवरात्रि डेट : 1 मार्च मंगलवार 2022 को मनाई जाएगी महाशिवरात्रि।


शुभ मुहुर्त :  

  • अभिजीत मुहुर्त : सुबह 11:47 से दोपहर 12:34 तक। 
  • विजय मुहुर्त : दोपहर 02:07 से दोपहर 02:53 तक। 
  • गोधूलि मुहुर्त : शाम 05:48 से 06:12 तक। 
  • सायाह्न संध्या मुहुर्त : शाम 06:00 से 07:14 तक। 
  • निशिता मुहुर्त : रात्रि 11:45 से 12:35 तक। 

खास संयोग : 

धनिष्ठा नक्षत्र में परिघ योग रहेगा।  धनिष्ठा के बाद शतभिषा नक्षत्र रहेगा।  परिघ के बाद शिव योग रहेगा।  सूर्य और चंद्र कुंभ राशि में रहेंगे।

पूजा विधि :

  1. महाशिवरात्रि की विधि-विधान से विशेष पूजा निशिता या निशीथ काल में होती है।  हालांकि चारों प्रहरों में से अपनी सुविधानुसार यह पूजन कर सकते हैं।  साथ ही महाशिवरात्रि के दिन रात्रि जागरण का भी विधान है |  
  2. महाशिवरात्रि पर शिवलिंग की पूजा होती है।  इस दिन मिट्टी के वर्तन ( लोटे ) में जल या दूध से भरकर शिवलिंग पर चढ़ाएं इसके बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, आंकड़े के फूल, चावल आदि अर्पित करें ।

मंत्र : महामृत्युंजय मंत्र या शिव के पंचशक्षर मंत्र ॐ नम: शिवाय का जाप इस दिन करना चाहिए।    


Mahashivratri Kab Ki Hai 2022

 फाल्गुन मास की कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है । माना जाता है कि सृष्टि का प्रारंभ इसी दिन से हुआ । पौराणिक कथाओं के अनुसार इस दिन सृष्टि का आरम्भ अग्निलिंग ( जो महादेव का विशालकाय स्वरूप है ) के उदय से हुआ । इसी दिन भगवान शिव का विवाह देवी पार्वती के साथ हुआ था । साल में होने वाली 12 शिवरात्रियों में से महाशिवरात्रि को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है |भारत सहित पूरी दुनिया में महाशिवरात्रि का पावन पर्व बहुत ही उत्साह के साथ मनाया जाता है |पौराणिक कथाओं के मुताबिक महाशिवरात्रि के दिन भगवान शिव शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए थे. इसी दिन पहली बार शिवलिंग की भगवान विष्णु और ब्रह्माजी ने पूजा की थी. मान्यता है कि इस घटना के चलते महाशिवरात्रि के दिन शिवलिंग की विशेष पूजा की जाती है |     

                                        
कथा के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन ही भगवान शंकर और माता पार्वती का विवाह हुआ था. इसी वजह से नेपाल में महाशिवरात्रि के तीन दिन पहले से ही मंदिरों को मंडप की तरह सजाया जाता है. मां पार्वती और शिव जी को दूल्हा-दुल्हन बनाकर घर-घर घुमाया जाता है और महाशिवरात्रि के दिन उनका विवाह कराया जाता है. इसी कथा के चलते माना जाता है कि कुवांरी कन्याओं द्वारा महाशिवरात्रि का व्रत रखने से शादी का संयोग जल्दी बनता है.


 

इस दिन शिवजी की पूजा अत्यंत शुभ फलदायी होती है। महाशिवरात्रि भगवान शिव के विवाह की रात्रि मानी गई है। इसे प्रकृति और पुरुष के संयोग का दिन भी कहा जाता है। जबकि अन्य शिवरात्रि इसकी पुनावृत्ति है. सावन का महीना भगवान शिव को समर्पित माना गया है क्योंकि इस समय शिवजी रुद्र रूप में सृष्टि का संचालन करते हैं। इसलिए सावन महीने की शिवरात्रि को भी महाशिवरात्रि के समान ही महत्व प्राप्त है।

महाशिवरात्रि के दिन शिव मंदिरों को बड़ी अच्छी तरह से सजाया जाता है। भक्तगण सारा दिन निराहार रहकर व्रत उपवास किया जाता है। अपनी सुविधा अनुसार सायंकाल में वे फल, बेर, दूध आदि लेकर शिव मंदिरों में जाते है। वहां दूध-मिश्रीत शुद्ध जल से शिवलिंग को स्नान कराते है। तत्पश्चात शिवलिंग पर फल, पुष्प व बेर तथा दूध भेंट स्वरुप चढ़ाया करते है। ऐसा करना बड़ा ही पुण्यदायक माना जाता है। इसके साथ ही भगवान शिव के वाहन नन्दी की भी इस रात बड़ी पूजा व सेवा की जाती है। महाशिवरात्रि के दिन गंगा-स्नान का भी विशेष महत्व है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव ने गंगा के तेज प्रवाह को अपनी जटाओं में धारण करके इस मृत्युलोक के उद्धार के लिए धीरे-धीरे  धरती पर छोड़ा था ।

                          

शिवरात्रि त्योहार की कथा

पूर्वकाल में चित्रभानु नाम का एक शिकारी था। शिकार करके वो अपने परिवार को चलाता था। वो एक साहूकार का कर्जदार था, लेकिन उसका ऋण समय पर नही चुका सका, क्रोधित सहुकार ने शिकारी को एक बार पकड़कर शिवमठ मेही  बन्दी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि  थी। शिकारी बहुत ध्यान से शिव से जुड़ी सभी धार्मिक बाते सुन रहा था। चतुदर्शी को उसने शिवरात्रि व्रत कथा भी सुनी शाम होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाकर ऋण चुकाने के बारे में पूछा तब शिकारी ने अगले दिन ऋण लौटाने का वचन देकर बन्धन मुक्त हो गया।

फिर दूसरे दिन अपनी दिनचर्या की भांति वह जंगल मे शिकार करने निकला । लेकिन दिनभर बंदी ग्रह में रहने के कारण वो भूख प्यास से व्याकुल होने लगा। शिकार खोजते हुए वो बहुत दूर निकल गया। जब अंधेरा होने लगा तो उसने सोचा की रात मुझे जंगल मे ही बितानी होँगी तभी उसे तलाब के किनारे बेल का पेड़ दिखा वो उस पेड़ पर चढ़कर रात बीतने के इंतजार करने लगा बेल के पेड़ के नीचे ही शिवलिंग था। जो बेलपत्रों से ढका हुआ था। शिकारी को उसका पता भी नही चला पड़ाव बनाते समय उसने जो टहनियां तोड़ी वे संयोग से शिवलिंग पर गिरती चली गयी। इस प्रकार दिन भर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चड़ गए। एक पहर रात्रि बीत जाने पर तलाब के पास एक हिरणी आई शिकारी ने अपनी वाण उठाई और तानने लगा ही था, कि हिरणी ने कहा रुक जाओ में गर्भवती हु। तुम एक नही दो जान लोगे तुम्हे पाप लगेगा। तो शिकारी ने उसे छोड़ दिया और वाण अन्दर करते वक्त कुछ बेलपत्र शिवलिंग पर गिर गए। इस प्रकार शिकारी की पहली पहर की पूजा हो गयी।

थोड़ी देर बाद फिर एक हिरणी आयी तब फिर शिकारी ने अपनी वाण तान दिया इस बार हिरणी ने कहा में अपने पति से मिलकर अभी आती हु तब तू मुझे मार देना शिकारी फिर वाण अंदर करते वक्त कुछ बेल पत्र फिर शिवलिंग पर गिर गए। शिकारी की दूसरे पहर की भी पूजा हो गयी। इस प्रका शिकारी की तीनों पहर की पूजा किसी ना किसी कारण से पूरी हो गयी। उसके इस प्रकार भूखे रखने की बजह से उसका व्रत हो गया और शिकार के बहाने उसकी पूजा हो गयी साथ ही जागरण भी हो गया। उसके इस तरह शिव जी पूजा से मोक्ष प्राप्त हुआ और जब उसकी मृतु हुई तो उसे यमलोक ले जाया जा रहा था। कि शिवगणों ने उसे शिवलोक भेज दिया। शिव जी की कृपा से अपने इस जन्म में राजा चित्रभानु अपने पिछले जन्म की याद रख पाया तथा महाशिवरात्रि को महत्व को पूजन कर उसका अगले जन्म में भी पालन कर पाए ।

 


 

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